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Sunday, June 16, 2019

वैदिक ज्योतिष

ज्योतिष विज्ञान-एक परिचय

विज्ञान के इस युग में भी ज्योतिष (Jyotish) की अपनी अलग पहचान कायम है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र (Jyotish Shastra) को विश्व के कुछ बेहद प्राचीन और विस्तृत ज्योतिष शास्त्रों में से एक माना जाता है। ज्योतिष विद्या ग्रह तथा नक्षत्रों से संबंध रखने वाली मानी जाती है। भारतीय ज्योतिषशास्त्र का वर्णन प्राचीन वेदों और पुराणों में भी मिलता है।

ज्योतिष को चिरकाल से सर्वोत्तम स्थान प्राप्त है । वेद शब्द की उत्पति “विद” धातु से हुई है जिसका अर्थ जानना या ज्ञान है

                        जन्म कुंडली (Janam Kundali)

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जन्म कुंडली को कई लोग जन्म पत्रिका, वैदिक कुंडली, हिन्दू कुंडली (Horoscope) ,टेवा आदि के नाम से भी जानते हैं। ऐसी कुंडली (Birth Chart) बनाते समय जातक के जन्म के समय नक्षत्रों और ग्रहों की सटिक स्थिति का आंकलन कर फलादेश बनाया जाता है।

जन्म समय के जन्म स्थान के रेखांश (Longitude) व अक्षांश (Latitude) के आधार पर ज्योतिषिय गणना कर सितारों और नक्षत्र के विषय में गणना करने के पश्चात एक ऐसी पत्रिका तैयार की जाती है जिसमें जातक के आने वाले भविष्य के बारें में बहुत ही भविष्यवाणी की जाती है। भारत में ज्यादातर परिवारों में कुंडली के आधार पर ही बच्चों का नामकरण होता है और शादी-विवाह आदि में भी इसको प्राथमिकता दी जाती है।

जन्म कुंडली (Janam Kundali) बनाते हुए जातक का सही जन्म समय बेहद अहम होता है। माना जाता है कि जन्म समय सही होने पर नवांश और दसवांश जैसे महत्वपूर्ण कारकों की जानकारी मिल जाती है। लेकिन इसके ना पता होने की सूरत में कुंडली भरोसेमंद नहीं मानी जाती।

अगर जन्म समय ना पता हो तो (What to do if you don’t know Birth Time)

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पाराशरीय पद्धति के अनुसार अगर जातक के सही जन्म समय का ज्ञान नहीं है तो कुंडली बनाने के बाद जातक के व्यवहार और उसके जीवन में घटित घटनाओं के आधार पर इसकी जांच कर लेनी चाहिए। और अगर यह ना मिले तो फलादेश प्रश्न कुंडली के आधार पर की जानी चाहिए। प्रश्न कुंडली भी एक तरह की कुंडली है लेकिन इसमें जन्म समय की जगह जिस समय कुंडली बनाई जाती है उस समय के ग्रहों की स्थिति की गणना की जाती है।

वैदिक कुंडली में मुख्यत: नौ ग्रह ,बारह राशियाँ, और सताईस नक्षत्रों का वर्णन होता है

नव ग्रह

ज्योतिष में सूर्य  का महत्त्व

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भारतीय वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूर्य को समस्त ग्रहों का राजा माना जाता है और इसे समस्त प्राणी जगत को जीवन प्रदान करने वाली उर्जा का केंद्र भी माना जाता है। सूर्य को ज्योतिष की गणनाओं के लिए पुरुष ग्रह माना जाता है। प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में सूर्य को आम तौर पर उसके पिता का प्रतिनिधि माना जाता है जो उस व्यक्ति के इस प्राणी जगत में जन्म लेने का प्रत्यक्ष कारक होता है ठीक उसी प्रकार जैसे सूर्य को इस प्राणी जगत को चलाने वाले प्रत्यक्ष देवता का रुप माना जाता है। कुंडली में सूर्य को कुंडली धारक के पूर्वजों का प्रतिनिधि भी माना जाता है क्योंकि वे कुंडली धारक के पिता के इस संसार में आने का प्रत्यक्ष कारक होते हैं। इस कारण से सूर्य पर किसी भी कुंडली में एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव होने पर उस कुंडली में पितृ दोष का निर्माण हो जाता है जो कुंडली धारक के जीवन में विभिन्न प्रकार की मुसीबतें तथा समस्याएं पैदा करने में सक्षम होता है।

पिता तथा पूर्वजों के अतिरिक्त सूर्य को राजाओं, राज्यों, प्रदेशों तथा देशों के प्रमुखों, उच्च पदों पर आसीन सरकारी अधिकारियों, सरकार, ताकतवर राजनीतिज्ञों तथा पुलिस अधिकारीयों, चिकित्सकों तथा ऐसे कई अन्य व्यक्तियों और संस्थाओं का प्रतिनिधि भी माना जाता है। सूर्य को प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा का, जीवन दायिनी शक्ति का, इच्छा शक्ति का, रोगों से लड़ने की शक्ति का, आँखों की रोशनी का, संतान पैदा करने की शक्ति का तथा विशेष रूप से नर संतान पैदा करने की शक्ति का, नेतृत्व करने की क्षमता का तथा अधिकार एवम नियंत्रण की शक्ति का प्रतीक भी माना जाता है

व्यक्ति के शरीर में सूर्य पित्त प्रवृति का प्रतिनिधित्व करते हैं क्योंकि सूर्य ग्रह के स्वभाव तथा अधिकार में अग्नि तत्व होता है। बारह राशियों में सूर्य अग्नि राशियों (मेष, सिंह तथा धनु) में स्थित होकर विशेष रूप से बलवान हो जाते हैं तथा मेष राशि में स्थित होने से सूर्य को सर्वाधिक बल प्राप्त होता है और इसी कारण इस राशि में सूर्य को उच्च का माना जाता है। मेष राशि के अतिरिक्त सूर्य सिंह राशि में स्थित होकर भी बली हो जाते हैं जो कि सूर्य की अपनी राशि है तथा इसके अतिरिक्त सूर्य धनु राशि में भी बलवान होते हैं जिसके स्वामी गुरू हैं। जिन व्यक्तियों की जन्म कुंडली में सूर्य बलवान तथा किसी भी बुरे ग्रह के प्रभाव से रहित होकर स्थित होते हैं ऐसे कुंडली धारक आम तौर पर जीवन भर स्वस्थ  रहते हैं क्योंकि सूर्य को सीधे तौर पर व्यक्ति के निरोग रहने की क्षमता का प्रतीक माना जाता है।

कुंडली में सूर्य बलवान होने से कुंडली धारक की रोग निरोधक क्षमता सामान्य से अधिक होती है तथा इसी कारण उसे आसानी से कोई रोग परेशान नहीं कर पाता। ऐसे व्यक्तियों का हृदय बहुत अच्छी तरह से काम करता है जिससे इनके शरीर में रक्त का सचार बड़े सुचारू रूप से होता है। ऐसे लोग शारीरिक तौर पर बहुत चुस्त-दुरुस्त होते हैं तथा आम तौर पर इनके शरीर का वजन भी सामान्य से बहुत अधिक या बहुत कम नहीं होता हालांकि इनमें से कुछ तथ्य कुंडली में दूसरे ग्रहों की शुभ या अशुभ स्थिति के साथ बदल भी सकते हैं। कुंडली में सूर्य के बलवान होने पर कुंडली धारक सामान्यतया समाज में विशेष प्रभाव रखने वाला होता है तथा अपनी संवेदनाओं और भावनाओं पर भली भांति अंकुश लगाने में सक्षम होता है। इस प्रकार के लोग आम तौर पर अपने जीवन के अधिकतर निर्णय तथ्यों के आधार पर ही लेते हैं न कि भावनाओं के आधार पर। ऐसे लोग सामान्यतया अपने निर्णय पर अडि़ग रहते हैं तथा इस कारण इनके आस-पास के लोग इन्हें कई बार अभिमानी भी समझ लेते हैं जो कि ये कई बार हो भी सकते हैं किन्तु अधिकतर मौकों पर ऐसे लोग तर्क के आधार पर लिए गए सही निर्णय की पालना ही कर रहे होते हैं तथा इनके अधिक कठोर लगने के कारण इनके आस-पास के लोग इन्हें अभिमानी समझ लेते हैं। अपने इन गुणों के कारण ऐसे लोगों में बहुत अच्छे नेता, राजा तथा न्यायाधीश बनने की क्षमता होती है।

पुरुषों की कुंडली में सूर्य का बलवान होना तथा किसी बुरे ग्रह से रहित होना उन्हें स्वस्थ तथा बुद्धिमान संतान पैदा करने की क्षमता प्रदान करता है तथा विशेष रुप से नर संतान पैदा करनी की क्षमता। बलवान सूर्य वाले कुंडली धारक आम तौर पर बहुत सी जिम्मेदारियों को उठाने वाले तथा उन्हें निभाने वाले होते हैं जिसके कारण आवश्यकता से अधिक काम करने के कारण कई बार इन्हें शारीरिक अथवा मानसिक तनाव का सामना भी करना पड़ता है। ऐसे लोग आम तौर पर पेट में वायु विकार जैसी समस्याओं तथा त्वचा के रोगों से पीडि़त हो सकते हैं जिसका कारण सूर्य का अग्नि स्वभाव होता है. जिससे पेट में कुछ विशेष प्रकार के विकार तथा रक्त में अग्नि तत्व की मात्रा बढ़ जाने से त्वचा से संबधित रोग भी हो सकते हैं। बारह राशियों में से कुछ राशियों में सूर्य का बल सामान्य से कम हो जाता है तथा यह बल सूर्य के तुला राशि में स्थित होने पर सबसे कम हो जाता है। इसी कारण सूर्य को तुला राशि में स्थित होने पर नीच माना जाता है क्योंकि तुला राशि में स्थित होने पर सूर्य अति बलहीन हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य कुंडली में अपनी स्थिति के कारण तथा एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों के प्रभाव में आने के कारण भी बलहीन हो जाते हैं तथा इनमें से अंतिम प्रकार की बलहीनता कुंडली धारक के लिए सबसे अधिक नुकसानदायक होती है। किसी कुंडली में यदि सूर्य तुला राशि में स्थित हों तथा तुला राशि में ही स्थित अशुभ शनि के प्रभाव में हों तो ऐसी हालत में सूर्य को भारी दोष लगता है क्योंकि तुला राशि में स्थित होने के कारण सूर्य पहले ही बलहीन हो जाते हैं तथा दूसरी तरफ तुला राशि में स्थित होने पर शनि को सर्वाधिक बल प्राप्त होता है क्योंकि तुला राशि में स्थित शनि उच्च के हो जाते हैं। ऐसी हालत में पहले से ही बलहीन सूर्य पर पूर्ण रूप से बली शनि ग्रह का अशुभ प्रभाव सूर्य को बुरी तरह से दूषित तथा बलहीन कर देता है जिससे कुंडली में भयंकर पितृ दोष का निर्माण हो जाता है जिसके कारण कुंडली धारक के जीवन में सूर्य के प्रतिनिधित्व में आने वाले सामान्य तथा विशेष, सभी क्षेत्रों पर  दुष्प्रभाव पड़ता है। इस लिए किसी भी व्यक्ति की कुंडली का अध्ययन करते समय कुंडली में सूर्य की स्थिति, बल तथा कुंडली के दूसरे शुभ तथा अशुभ ग्रहों के सूर्य पर प्रभाव को ध्यानपूर्वक देखना अति आवश्यक है।

ज्योतिष में चन्द्रमा का महत्त्व

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भारतीय वैदिक ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व दिया जाता है तथा व्यक्ति के जीवन से लेकर विवाह और फिर मृत्यु तक बहुत से क्षेत्रों के बारे में जानने के लिए कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना आवश्यक माना जाता है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित हों, उसी नक्षत्र को उस व्यक्ति का जन्म नक्षत्र माना जाता है जिसके साथ उसके जीवन के कई महत्त्वपूर्ण तथ्य जुड़े होते हैं जैसे कि व्यक्ति का नाम भी उसके जन्म नक्षत्र के अक्षर के अनुसार ही रखा जाता है।

भारतीय ज्योतिष पर आधारित दैनिक, साप्ताहिक तथा मासिक भविष्य फल भी व्यक्ति की जन्म के समय की चन्द्र राशि के आधार पर ही बताए जाते हैं। किसी व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में स्थित होते हैं, वह राशि उस व्यक्ति की चन्द्र राशि कहलाती है। भारतीय ज्योतिष में विवाह संबंधित वर-वधू के आपस में तालमेल को परखने के लिए प्रयोग की जाने वाली कुंडली मिलान की प्रणाली में आम तौर पर गुण मिलान को ही सबसे अधिक महत्त्व दिया जाता है जो कि पूर्णतया वर-वधू की कुंडलियों में चन्द्रमा की स्थिति के आधारित होता है। वैदिक ज्योतिष के एक मत के अनुसार विवाह दो मनों का पारस्परिक मेल होता है तथा चन्द्रमा प्रत्येक व्यक्ति के मन का सीधा कारक होने के कारण इस मेल को देखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय ज्योतिष में प्रचलित गंड मूल दोष भी चन्द्रमा की कुंडली में स्थिति से ही देखा जाता है तथा वैदिक ज्योतिष के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में प्रभाव डालने वाली विंशोत्तरी दशाएं भी व्यक्ति की जन्म कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति के अनुसार ही देखी जाती हैं। इस प्रकार चन्द्रमा का भारतीय ज्योतिष के अनेक क्षेत्रों में बहुत महत्त्व है तथा कुंडली में इस ग्रह की स्थिति को भली-भांति समझना आवश्यक है।

चन्द्रमा एक शीत और नम ग्रह हैं तथा ज्योतिष की गणनाओं के लिए इन्हें स्त्री ग्रह माना जाता है। चन्द्रमा प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में मुख्य रूप से माता तथा मन के कारक माने जाते हैं और क्योंकि माता तथा मन दोनों ही किसी भी व्यक्ति के जीवन में विशेष महत्त्व रखते हैं, इसलिए कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति कुंडली धारक के लिए अति महत्त्वपूर्ण होती है। माता तथा मन के अतिरिक्त चन्द्रमा रानियों, जन-संपर्क के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकारियों, परा-शक्तियों के माध्यम से लोगों का उपचार करने वाले व्यक्तियों, चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों, होटल व्यवसाय तथा इससे जुड़े व्यक्तियों तथा सुविधा और ऐशवर्य से जुडे ऐसे दूसरे क्षेत्रों तथा व्यक्तियों, सागरों तथा संसार में उपस्थित पानी की छोटी-बड़ी सभी इकाईयों तथा इनके साथ जुड़े व्यवसायों और उन व्यवसायों को करने वाले लोगों के भी कारक होते हैं।

किसी व्यक्ति की कुंडली से उसके चरित्र को देखते समय चन्द्रमा की स्थिति अति महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि चन्द्रमा सीधे तौर से प्रत्येक व्यक्ति के मन तथा भावनाओं को नियंत्रित करते हैं। चन्द्रमा वृष राशि में स्थित होकर सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं तथा इस राशि में स्थित चन्द्रमा को उच्च का चन्द्रमा कहा जाता है। वृष के अतिरिक्त चन्द्रमा कर्क राशि में स्थित होने से भी बलवान हो जाते हैं जो कि चन्द्रमा की अपनी राशि है। चन्द्रमा के कुंडली में बलशाली होने पर तथा भली प्रकार से स्थित होने पर कुंडली धारक स्वभाव से मृदु, संवेदनशील, भावुक तथा अपने आस-पास के लोगों से स्नेह रखने वाला होता है। ऐसे लोगों को आम तौर पर अपने जीवन में सुख-सुविधाएं प्राप्त करने के लिए अधिक प्रयास नहीं करने पड़ते तथा इन्हें बिना प्रयासों के ही सुख-सुविधाएं ठीक उसी प्रकार प्राप्त होती रहतीं हैं जिस प्रकार किसी राजा की रानी को केवल अपने रानी होने के आधार पर ही संसार के समस्त ऐश्वर्य प्राप्त हो जाते हैं।

क्योंकि चन्द्रमा मन और भावनाओं पर नियंत्रण  रखते हैं, इसलिए चन्द्रमा के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक आम तौर पर भावुक होने के कारण आसानी से ही आहत भी हो जाते हैं। स्वभाव से ऐसे लोग चंचल तथा संवेदनशील होते हैं तथा अपने प्रियजनों का बहुत ध्यान रखते हैं और उनसे भी ऐसी ही अपेक्षा रखते हैं तथा इस अपेक्षा के पूर्ण न होने की हालत में शीघ्र ही आहत हो जाते हैं। किन्तु अपने प्रियजनों के द्वारा आहत होने के बाद भी ऐसे लोग शीघ्र ही सबकुछ भुला कर फिर से अपने सामान्य व्यवहार में लग जाते हैं। चन्द्रमा के प्रबल प्रभाव वाले जातक कलात्मक क्षेत्रों में विशेष रूचि रखते हैं तथा इन क्षेत्रों में सफलता भी प्राप्त करते हैं। किसी कुंडली में चन्द्रमा का विशेष शुभ प्रभाव जातक को ज्योतिषि, आध्यात्मिक रूप से विकसित व्यक्ति तथा परा शक्तियों का ज्ञाता भी बना सकता है।

चन्द्रमा मनुष्य के शरीर में  प्रवृति तथा जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा शरीर के अंदर द्रव्यों की मात्रा, बल तथा बहाव को नियंत्रित करते हैं। चन्द्रमा के प्रबल प्रभाव वाले जातक सामान्य से अधिक वजनी हो सकते हैं जिसका कारण मुख्य तौर पर चन्द्रमा का जल तत्व पर नियंत्रण होना ही होता है जिसके कारण ऐसे जातकों में सामान्य से अधिक निद्रा लेने की प्रवृति बन जाती है तथा कुछेक जातकों को काम कम करने की आदत होने से या अवसर ही कम मिलने के कारण भी उनके शरीर में चर्बी की मात्रा बढ़ जाती है। ऐसे जातकों को आम तौर पर कफ तथा शरीर के द्रव्यों से संबंधित रोग या मानसिक परेशानियों से सम्बन्धित रोग ही लगते हैं।

कुंडली में चन्द्रमा के बलहीन होने पर अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव में आकर दूषित होने पर जातक की मानसिक शांति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा उसे मिलने वाली सुख-सुविधाओं में भी कमी आ जाती है। चन्द्रमा वृश्चिक राशि में स्थित होकर बलहीन हो जाते हैं तथा इसके अतिरिक्त कुंडली में अपनी स्थिति विशेष और अशुभ ग्रहों के प्रभाव के कारण भी चन्द्रमा बलहीन हो जाते हैं। किसी कुंडली में अशुभ राहु तथा केतु का प्रबल प्रभाव चन्द्रमा को बुरी तरह से दूषित कर सकता है तथा कुंडली धारक को मानसिक रोगों से पीड़ित  भी कर सकता है। चन्द्रमा पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव जातक को अनिद्रा तथा बेचैनी जैसी समस्याओं से भी पीड़ित  कर सकता है जिसके कारण जातक को नींद आने में बहुत कठिनाई होती है। इसके अतिरिक्त चन्द्रमा की बलहीनता अथवा चन्द्रमा पर अशुभ ग्रहों के प्रभाव के कारण विभिन्न प्रकार के जातकों को उनकी जन्म कुंडली में चन्द्रमा के अधिकार में आने वाले क्षेत्रों से संबंधित समस्याएं आ सकती हैं।

ज्योतिष में मंगल का महत्त्व

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भारतीय वैदिक ज्योतिष में मंगल ग्रह को मुख्य तौर पर ताकत और मर्दानगी का कारक माना जाता है। मंगल प्रत्येक व्यक्ति में शारीरिक ताकत तथा मानसिक शक्ति एवम मजबूती का प्रतिनिधित्व करते हैं। मानसिक शक्ति का अभिप्राय यहां पर निर्णय लेने की क्षमता और उस निर्णय पर टिके रहने की क्षमता से है। मंगल के प्रबल प्रभाव वाले जातक आम तौर पर तथ्यों के आधार पर उचित निर्णय लेने में तथा उस निर्णय को व्यवहारिक रूप देने में भली प्रकार से सक्षम होते हैं। ऐसे जातक सामान्यतया किसी भी प्रकार के दबाव के आगे घुटने नहीं टेकते तथा इनके ऊपर  दबाव डालकर अपनी बात मनवा लेना बहुत कठिन होता है और इन्हें दबाव की अपेक्षा तर्क देकर समझा लेना ही उचित होता है।

मंगल आम तौर पर ऐसे क्षेत्रों का ही प्रतिनिधित्व करते हैं जिनमें साहस, शारीरिक बल, मानसिक क्षमता आदि की आवश्यकता पड़ती है जैसे कि पुलिस की नौकरी, सेना की नौकरी, अर्ध-सैनिक बलों की नौकरी, अग्नि-शमन सेवाएं, खेलों में शारीरिक बल तथा क्षमता की परख करने वाले खेल जैसे कि कुश्ती, दंगल, टैनिस, फुटबाल, मुक्केबाजी तथा ऐसे ही अन्य कई खेल जो बहुत सी शारीरिक ऊर्जा  तथा क्षमता की मांग करते हैं। इसके अतिरिक्त मंगल ऐसे क्षेत्रों तथा व्यक्तियों के भी कारक होते हैं जिनमें हथियारों अथवा औजारों का प्रयोग होता है जैसे हथियारों के बल पर प्रभाव जमाने वाले गिरोह, शल्य चिकित्सा करने वाले चिकित्सक तथा दंत चिकित्सक जो चिकित्सा के लिए धातु से बने औजारों का प्रयोग करते हैं, मशीनों को ठीक करने वाले मैकेनिक जो औजारों का प्रयोग करते हैं तथा ऐसे ही अन्य क्षेत्र एवम इनमे काम करने वाले लोग। इसके अतिरिक्त मंगल भाइयों के कारक भी होते हैं तथा विशेष रूप से छोटे भाइयों के। मंगल पुरूषों की कुंडली में दोस्तों के कारक भी होते हैं तथा विशेष रूप से उन दोस्तों के जो जातक के बहुत अच्छे मित्र हों तथा जिन्हें भाइयों के समान ही समझा जा सके।

मंगल एक शुष्क तथा आग्नेय ग्रह हैं तथा मानव के शरीर में मंगल अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा इसके अतिरिक्त मंगल मनुष्य के शरीर में कुछ सीमा तक जल तत्व का प्रतिनिधित्व भी करते हैं क्योंकि मंगल रक्त के सीधे कारक माने जाते हैं। ज्योतिष की गणनाओं के लिए मंगल को पुरूष ग्रह माना जाता है। मंगल मकर राशि में स्थित होने पर सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं तथा मकर में स्थित मंगल को उच्च का मंगल भी कहा जाता है। मकर के अतिरिक्त मंगल को मेष तथा वृश्चिक राशियों में स्थित होने से भी अतिरिक्त बल मिलता है जोकि मंगल की अपनी राशियां हैं।

मंगल के प्रबल प्रभाव वाले जातक शारीरिक रूप से बलवान तथा साहसी होते हैं। ऐसे जातक स्वभाव से जुझारू होते हैं तथा विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी हिम्मत से काम लेते हैं तथा सफलता प्राप्त करने के लिए बार-बार प्रयत्न करते रहते हैं और अपने रास्ते में आने वाली बाधाओं तथा मुश्किलों के कारण आसानी से विचलित नहीं होते। मंगल का कुंडली में विशेष प्रबल प्रभाव कुंडली धारक को तर्क के आधार पर बहस करने की विशेष क्षमता प्रदान करता है जिसके कारण जातक एक अच्छा वकील अथवा बहुत अच्छा वक्ता भी बन सकता है। मंगल के प्रभाव में वक्ता बनने वाले लोगों के वक्तव्य आम तौर पर क्रांतिकारी ही होते हैं तथा ऐसे लोग अपने वक्तव्यों के माध्यम से ही जन-समुदाय तथा समाज को एक नई दिशा देने में सक्षम होते हैं। युद्ध-काल के समय अपनी वीरता के बल पर समस्त जगत को प्रभावित करने वाले जातक मुख्य तौर पर मंगल के प्रबल प्रभाव में ही पाए जाते हैं।

कर्क राशि में स्थित होने पर मंगल बलहीन हो जाते हैं तथा इसके अतिरिक्त मंगल कुंडली में अपनी स्थिति विशेष के कारण अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव के कारण भी कमजोर हो सकते हैं। कुंडली में मंगल की बलहीनता कुंडली धारक की शारीरिक तथा मानसिक ऊर्जा  पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है तथा इसके अतिरिक्त जातक रक्त-विकार संबधित बीमारियों , तव्चा के रोगों, चोटों तथा अन्य ऐसे बीमारियों  से पीड़ित हो सकता है जिसके कारण जातक के शरीर की चीर-फाड़ हो सकती है तथा अत्याधिक मात्रा में रक्त भी बह सकता है। मंगल पर किन्हीं विशेष ग्रहों के बुरे प्रभाव के कारण जातक किसी दुर्घटना अथवा लड़ाई में अपने शरीर का कोई अंग भी गंवा सकता है। इसके अतिरिक्त कुंडली में मंगल की बलहीनता जातक को सिरदर्द, थकान, चिड़चिड़ापन, तथा निर्णय लेने में अक्षमता जैसी समस्याओं से भी पीड़ित  कर सकती है।

ज्योतिष में बुध का महत्त्व

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भारतीय वैदिक ज्योतिष में बुध ग्रह को मुख्य रूप से वाणी और बुद्धि का कारक माना जाता है। इसलिए बुध के प्रबल प्रभाव वाले जातक आम तौर पर बहुत बुद्धिमान होते हैं तथा उनका अपनी वाणी पर बहुत अच्छा नियंत्रण होता है जिसके चलते वे अपनी बुद्धि तथा वाणी कौशल के बल पर मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों को भी अपने अनुकूल बना लेने में सक्षम होते हैं। ऐसे जातकों की वाणी तथा व्यवहार आम तौर पर अवसर के अनुकूल ही होता है जिसके कारण ये अपने जीवन में बहुत लाभ प्राप्त करते हैं। किसी भी व्यक्ति से अपनी बुद्धि तथा वाणी के बल पर अपना काम निकलवा लेना ऐसे लोगों की विशेषता होती है तथा किसी प्रकार की बातचीत, बहस या वाक प्रतियोगिता में इनसे जीत पाना अत्यंत कठिन होता है। आम तौर पर ऐसे लोग सामने वाले की शारीरिक मुद्रा तथा मनोस्थिति का सही आंकलन कर लेने के कारण उस द्वारा  पूछे जाने वाले संभावित प्रश्नों के बारे में पहले से ही अनुमान लगा लेते हैं तथा इसी कारण सामने वाले व्यक्ति के प्रश्न पूछते ही ये उसका उत्तर तुरंत दे देते हैं। इसलिए ऐसे लोगों से बातचीत में पार पाना किसी साधारण व्यक्ति के बस की बात नहीं होती तथा ऐसे जातक अपने वाणी कौशल तथा बुद्धि के बल पर आसानी से सच को झूठ तथा झूठ को सच साबित कर देने में भी सक्षम होते हैं।

अपनी इन्हीं विशेषताओं के चलते बुध आम तौर पर उन्हीं क्षेत्रों तथा उनसे जुड़े लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनमें सफलता प्राप्त करने के लिए चतुर वाणी, तेज गणना तथा बुद्धि कौशल की आवश्यकता दूसरे क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक होती है जैसे कि वकील, पत्रकार, वित्तिय सलाहकार तथा अन्य प्रकार के सलाहकार, अनुसंधान तथा विश्लेषणात्मक क्षेत्रों से जुड़े व्यक्ति, मार्किटिंग क्षेत्र से जुड़े लोग, व्यापार जगत से जुड़े लोग, मध्यस्थता करके मुनाफा कमाने वाले लोग, अकाउंटेंट, साफ्टवेयर इंजीनियर, राजनीतिज्ञ, राजनयिक, अध्यापक, लेखक ऐसे ही अन्य व्यवसाय तथा उनसे जुड़े लोग। इस प्रकार यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आज के इस व्यसायिक जगत में बुध ग्रह के प्रभाव वाले जातक ही सबसे अधिक सफल पाये जाते हैं।

बुध को ज्योतिष की गणनाओं के लिए ज्योतिषियों का एक वर्ग तटस्थ अथवा नपुंसक ग्रह मानता है जबकि ज्योतिषियों का दूसरा वर्ग इन्हें स्त्री ग्रह मानता है। मनुष्य के शरीर में बुध मुख्य रूप से वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। कन्या राशि में स्थित होने से बुध सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं जो कि इनकी अपनी राशि है तथा इस राशि में स्थित होने पर बुध को उच्च का बुध भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त मिथुन राशि में स्थित होने से भी बुध को अतिरिक्त बल प्राप्त होता है तथा यह राशि भी बुध की अपनी राशि है। कुंडली में बुध का प्रबल प्रभाव होने पर कुंडली धारक सामान्यतया बहुत व्यवहार कुशल होता है तथा कठिन से कठिन अथवा उलझे से उलझे मामलों को भी कूटनीति से ही सुलझाने में विश्वास रखता है। ऐसे जातक बड़े शांत स्वभाव के होते हैं तथा प्रत्येक मामले को सुलझाने में अपनी चतुराई से ही काम लेते हैं तथा इसी कारण ऐसे जातक अपने सांसारिक जीवन में बड़े सफल होते हैं जिसके कारण कई बार इनके आस-पास के लोग इन्हें स्वार्थी तथा पैसे के पीछे भागने वाले भी कह देते हैं किन्तु ऐसे जातक अपनी धुन के बहुत पक्के होते हैं तथा लोगों की कही बातों पर विचार न करके अपने काम में ही लगे रहते हैं।

बुध मीन राशि मे स्थित होने पर बलहीन हो जाते हैं और इसी कारण मीन राशि में स्थित बुध को नीच का बुध भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त बुध किसी कुंडली में अपनी स्थिति विशेष के कारण अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव के कारण भी बलहीन हो सकते हैं जिसके कारण जातक पेट, गले या नर्वस तंत्र से संबंधित समस्याओं अथवा बीमारियों  से  पीड़ित हो सकता है। इसके अतिरिक्त बुध पर किन्हीं विशेष बुरे ग्रहों का प्रभाव कुंडली धारक को आंतों की बीमारी , दमा, त्वचा के रोग, अनिद्रा, मनोवैज्ञानिक रोग तथा ऐसी ही कई अन्य बीमारियों  से  पीड़ित कर सकता है।

ज्योतिष में गुरु/बृहस्पति का महत्व

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भारत को आध्यात्म, तीर्थ स्थानों, मंदिरों , तथा साधु-संतों के देश के रूप में जाना जाता है तथा भारतवर्ष के साथ जुड़ीं इन सभी विशेषताओं के कारक ग्रह बृहस्पति हैं जिन्हें ज्योतिष की साधारण भाषा में गुरू के नाम से भी जाना जाता है। भारतीय वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति को समस्त देवताओं तथा ग्रहों का गुरू माना जाता है तथा इस ग्रह को समस्त ग्रहों में सबसे पवित्र तथा पावन माना जाता है। गुरू मुख्य रूप से साधु-संतों, आध्यात्मिक गुरुओं तथा आध्यात्मिक रुप से विकसित व्यक्तियों, तीर्थ स्थानों तथा मंदिरों, पवित्र नदियों तथा पवित्र पानी के जल स्तोत्रों, धार्मिक साहित्य तथा पीपल के वृक्ष के कारक माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त गुरु ग्रह को अध्यापकों, ज्योतिषियों, दार्शनिकों, वित्तिय संस्थानों में कार्य करने वाले व्यक्तियों, लेखकों, कलाकारों तथा अन्य कई प्रकार के क्षेत्रों तथा व्यक्तियों का कारक भी माना जाता है।

गुरू स्वभाव से नम ग्रह हैं तथा ज्योतिष की गणनाओं के लिए इन्हें नर ग्रह माना जाता है। कर्क राशि में स्थित होकर गुरू सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं तथा इस राशि में स्थित गुरू को उच्च का गुरू कहा जाता है। कर्क राशि के अतिरिक्त गुरू धनु तथा मीन राशियों में स्थित होने पर भी बलशाली हो जाते हैं जो इनकी अपनी राशियां हैं। कुंडली में गुरू के बलवान होने पर तथा बुरे ग्रहों के प्रभाव से रहित होने पर जातक का शरीर आम तौर पर स्वस्थ तथा मजबूत होता है। गुरू के प्रबल प्रभाव वाले जातक आम तौर पर दयालु, दूसरों का ध्यान रखने वाले, धार्मिक तथा मानवीय मूल्यों को समझने वाले होते हैं। ऐसे जातक बहुत बुद्धिमान होते हैं तथा मुश्किल से मुश्किल विषयों को भी आसानी से समझ लेने की क्षमता रखते हैं। ऐसे जातक अच्छे तथा सृजनात्मक कार्य करने वाले होते हैं तथा इस कारण समाज में इनका एक विशेष आदर होता है।

गुरू के प्रबल प्रभाव वाले जातकों की वित्तिय स्थिति मजबूत होती है तथा आम तौर पर इन्हें अपने जीवन काल में किसी गंभीर वित्तिय संकट का सामना नहीं करना पड़ता। ऐसे जातक सामान्यतया विनोदी स्वभाव के होते हैं तथा जीवन के अधिकतर क्षेत्रों में इनका दृष्टिकोण सकारात्मक होता है। ऐसे जातक अपने जीवन में आने वाले कठिन समयों में भी अधिक विचलित नहीं होते तथा अपने सकारात्मक रुख के कारण इन कठिन समयों में से भी अपेक्षाकृत आसानी से निकल जाते हैं। ऐसे जातक आशावादी होते हैं तथा निराशा का आम तौर पर इनके जीवन में लंबी अवधि के लिए प्रवेश नहीं होता जिसके कारण ऐसे जातक अपने जीवन के प्रत्येक पल का पूर्ण आनंद उठाने में सक्षम होते हैं। ऐसे जातकों के अपने आस-पास के लोगों के साथ मधुर संबंध होते हैं तथा आवश्यकता के समय वे अपने प्रियजनों की हर संभव प्रकार से सहायता करते हैं। इनके आभा मंडल से एक विशेष तेज निकलता है जो इनके आस-पास के लोगों को इनके साथ संबंध बनाने के लिए तथा इनकी संगत में रहने के लिए प्रेरित करता है। आध्यात्मिक पथ पर भी ऐसे जातक अपेक्षाकृत शीघ्रता से ही परिणाम प्राप्त कर लेने में सक्षम होते हैं।

गुरू का प्रबल प्रभाव जातक को विभिन्न प्रकार के पकवानों तथा व्यंजनों का रसिया बना सकता है जिसके कारण ऐसे जातक कई बार सामान्य से अधिक खाने वाले होते हैं तथा अपनी इसी आदत के कारण ऐसे जातकों को शरीर पर अतिरिक्त चर्बी चढ़ जाने की शिकायत भी हो जाती है। ऐसे जातकों की धार्मिक कार्यों में तथा परोपकार के कार्यों में भी रूचि होती है तथा समाज के पिछड़े वर्गों के लिए काम करने में भी इन्हें आनंद मिलता है।

गुरू मकर राशि में स्थित होने पर बलहीन हो जाते हैं तथा मकर राशि में स्थित गुरू को नीच का गुरू भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त गुरू किसी कुंडली विशेष में अपनी स्थिति के कारण अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव के कारण भी बलहीन हो सकते हैं। गुरू के बलहीन होने की स्थिति में जातक अग्नाशय से संबंधित बीमारियों जैसे मधुमेह, पित्ताशय से संबधित बीमारियों  से, श्रवण संबंधित बीमारीयों से तथा पीलिया जैसी बीमारियों से पीड़ित  हो सकता है। इसके अतिरिक्त कुंडली में गुरू के बलहीन होने से जातक को शरीर की चर्बी को नियंत्रित करने में भी मुश्किल हो सकती है जिसके कारण वह बहुत मोटा या बहुत पतला हो सकता है। किसी कुंडली में गुरू पर अशुभ राहु का प्रबल प्रभाव कुंडली धारक को आध्यात्मिकता तथा धार्मिक कार्यों से पूर्ण रूप से विमुख कर सकता है अथवा ऐसा जातक धर्म तथा आध्यात्मिकता के नाम पर लोगों को ठगने वाला कपटी भी हो सकता है। इसी प्रकार विभिन्न प्रकार के अशुभ ग्रहों का किसी कुंडली में गुरू पर प्रबल प्रभाव कुंडली धारक के लिए विभिन्न प्रकार की समस्याएं पैदा कर सकता है।

ज्योतिष में शुक्र का महत्त्व

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भारतीय वैदिक ज्योतिष में शुक्र को मुख्य रूप से पति या पत्नी अथवा प्रेमी या प्रेमिका का कारक माना जाता है। कुंडली धारक के दिल से अर्थात प्रेम संबंधों से जुड़ा कोई भी मामला देखने के लिए कुंडली में इस ग्रह की स्थिति देखना अति आवश्यक हो जाता है। कुंडली धारक के जीवन में पति या पत्नी का सुख देखने के लिए भी कुंडली में शुक्र की स्थिति अवश्य देखनी चाहिए। शुक्र को सुंदरता की देवी भी कहा जाता है और इसी कारण से सुंदरता, ऐश्वर्य तथा कला के साथ जुड़े अधिकतर क्षेत्रों के कारक शुक्र ही होते हैं, जैसे कि फैशन जगत तथा इससे जुड़े लोग, सिनेमा जगत तथा इससे जुड़े लोग, रंगमंच तथा इससे जुड़े लोग, चित्रकारी तथा चित्रकार, नृत्य कला तथा नर्तक-नर्तकियां, इत्र तथा इससे संबंधित व्यवसाय, डिजाइनर कपड़ों का व्यवसाय, होटल व्यवसाय तथा अन्य ऐसे व्यवसाय जो सुख-सुविधा तथा ऐश्वर्य से जुड़े हैं।

शुक्र एक नम ग्रह हैं तथा ज्योतिष की गणनाओं के लिए इन्हें स्त्री ग्रह माना जाता है। शुक्र मीन राशि में स्थित होकर सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं जो बृहस्पति के स्वामित्व में आने वाली एक जल राशि है। मीन राशि में स्थित शुक्र को उच्च का शुक्र भी कहा जाता है। मीन राशि के अतिरिक्त शुक्र वृष तथा तुला राशि में स्थित होकर भी बलशाली हो जाते हैं जो कि इनकी अपनी राशियां हैं। कुंडली में शुक्र का प्रबल प्रभाव कुंडली धारक को शारीरिक रूप से सुंदर और आकर्षक बना देता है तथा उसकी इस सुंदरता और आकर्षण से सम्मोहित होकर लोग उसकी ओर खिंचे चले आते हैं तथा विशेष रूप से विपरीत लिंग के लोग। शुक्र के प्रबल प्रभाव वाले जातक शेष सभी ग्रहों के जातकों की अपेक्षा अधिक सुंदर होते हैं। शुक्र के प्रबल प्रभाव वालीं महिलाएं अति आकर्षक होती हैं तथा जिस स्थान पर भी ये जाती हैं, पुरुषों की लंबी कतार इनके पीछे पड़ जाती है। शुक्र के जातक आम तौर पर फैशन जगत, सिनेमा जगत तथा ऐसे ही अन्य क्षेत्रों में सफल होते हैं जिनमें सफलता पाने के लिए शारीरिक सुंदरता को आवश्यक माना जाता है।

शुक्र शारीरिक सुखों के भी कारक होते हैं तथा संभोग से लेकर हार्दिक प्रेम तक सब विषयों को जानने के लिए कुंडली में शुक्र की स्थिति महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। शुक्र का प्रबल प्रभाव जातक को रसिक बना देता है तथा आम तौर पर ऐसे जातक अपने प्रेम संबंधों को लेकर संवेदनशील होते हैं। शुक्र के जातक सुंदरता और एश्वर्यों का भोग करने में शेष सभी प्रकार के जातकों से आगे होते हैं। शरीर के अंगों में शुक्र जननांगों के कारक होते हैं तथा महिलाओं के शरीर में शुक्र प्रजनन प्रणाली का प्रतिनिधित्व भी करते हैं तथा महिलाओं की कुंडली में शुक्र पर किसी बुरे ग्रह का प्रबल प्रभाव उनकी प्रजनन क्षमता पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है।

शुक्र कन्या राशि में स्थित होने पर बलहीन हो जाते हैं तथा इसके अतिरिक्त कुंडली में अपनी स्थिति विशेष के कारण अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव में आकर भी शुक्र बलहीन हो जाते हैं। शुक्र पर बुरे ग्रहों का प्रबल प्रभाव जातक के वैवाहिक जीवन अथवा प्रेम संबंधों में समस्याएं पैदा कर सकता है। महिलाओं की कुंडली में शुक्र पर बुरे ग्रहों का प्रबल प्रभाव उनकी प्रजनन प्रणाली को कमजोर कर सकता है तथा उनके ॠतुस्राव, गर्भाशय अथवा अंडाशय पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है जिसके कारण उन्हें संतान पैदा करनें में परेशानियां आ सकतीं हैं।

कुंडली में शुक्र पर अशुभ राहु का विशेष प्रभाव जातक के भीतर शारीरिक वासनाओं को आवश्यकता से अधिक बढ़ा देता है जिसके चलते जातक अपनी बहुत सी शारीरिक ऊर्जा  तथा पैसा इन वासनाओं को पूरा करने में ही गंवा देता है जिसके कारण उसकी सेहत तथा प्रजनन क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है तथा कुछेक मामलों में तो जातक किसी गुप्त रोग से पीड़ित  भी हो सकता है जो कुंडली के दूसरे ग्रहों की स्थिति पर निर्भर करते हुए जानलेवा भी साबित हो सकता है।

ज्योतिष में शनि का महत्त्व

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भारतीय ज्योतिष को मानने वाले अधिकतर लोग शनि ग्रह से सबसे अधिक भयभीत रहते हैं तथा अपनी जन्म कुंडली से लेकर गोचर, महादशा तथा साढ़ेसती में इस ग्रह की स्थिति और उससे होने वाले लाभ या हानि को लेकर चिंतित रहते हैं तथा विशेष रुप से हानि को लेकर। शनि ग्रह को भारतवर्ष में शनिदेव तथा शनि महाराज के नाम से संबोधित किया जाता है तथा भारतीय ज्योतिष में विश्वास रखने वाले बहुत से लोग यह मानते हैं कि नकारात्मक होने पर यह ग्रह कुंडली धारक को किसी भी अन्य ग्रह की अपेक्षा बहुत अधिक नुकसान पहुंचा सकता है। शनि ग्रह के भारतीय ज्योतिष में विशेष महत्व को इस तथ्य से आसानी से समझा जा सकता है कि भारत में शनि मंदिरों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है तथा इन मंदिरों में आने वाले लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। इनमें से अधिकतर लोग शनि मंदिरों में शनिवार वाले दिन ही जाते हैं तथा शनिदेव की कारक वस्तुएं जैसे कि उड़द की साबुत काली दाल तथा सरसों का तेल शनि महाराज को अर्पण करते हैं तथा उनकी कृपा दृष्टि के लिए प्रार्थना करते हैं।

शनि मुख्य रूप से शारीरिक श्रम से संबंधित व्यवसायों तथा इनके साथ जुड़े व्यक्तियों के कारक होते हैं जैसे कि श्रम उद्योगों में काम करने वाले श्रमिक, इमारतों का निर्माण कार्य तथा इसमें काम करने वाले श्रमिक, निर्माण कार्यों में प्रयोग होने वाले भारी वाहन जैसे रोड रोलर, क्रेन, डिच मशीन तथा इन्हें चलाने वाले चालक तथा इमारतों, सड़कों तथा पुलों के निर्माण में प्रयोग होने वाली मशीनरी और उस मशीनरी को चलाने वाले लोग।

इसके अतिरिक्त शनि जमीन के क्रय-विक्रय के व्यवसाय, इमारतों को बनाने या फिर बना कर बेचने के व्यवसाय तथा ऐसे ही अन्य व्यवसायों, होटल में वेटर का काम करने वाले लोगों, द्वारपालों, भिखारियों, अंधों, कोढ़ियों, लंगड़े व्यक्तियों, कसाईयों, लकड़ी का काम करने वाले लोगों, जन साधारण के समर्थन से चलने वाले नेताओं, वैज्ञानिकों, अन्वेषकों, अनुसंधान क्षेत्र में काम करने वाले लोगों, इंजीनियरों, न्यायाधीशों, परा शक्तियों तथा इसका ज्ञान रखने वाले लोगों तथा अन्य कई प्रकार के क्षेत्रों तथा उनसे जुड़े व्यक्तियों के कारक होते हैं।

शनि मनुष्य के शरीर में मुख्य रूप से वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा ज्योतिष की गणनाओं के लिए ज्योतिषियों का एक वर्ग  इन्हें तटस्थ अथवा नपुंसक ग्रह मानता है जबकि ज्योतिषियों का एक अन्य वर्ग इन्हें पुरुष ग्रह मानता है। तुला राशि में स्थित होने से शनि को सर्वाधिक बल प्राप्त होता है तथा इस राशि में स्थित शनि को उच्च का शनि भी कहा जाता है। तुला के अतिरिक्त शनि को मकर तथा कुंभ में स्थित होने से भी अतिरिक्त बल प्राप्त होता है जो शनि की अपनी राशियां हैं।

शनि के प्रबल प्रभाव वाले जातक आम तौर पर इंजीनियर, जज, वकील, आई टी क्षेत्र में काम करने वाले लोग, रिअल ऐस्टेट का काम करने वाले लोग, परा शक्तियों के क्षेत्रों में काम करने वाले लोग तथा शनि ग्रह के कारक अन्य व्यवसायों से जुड़े लोग ही होते हैं। शनि के जातक आम तौर पर अनुशासन तथा नियम की पालना करने वाले, विश्लेषनात्मक, मेहनती तथा अपने काम पर ध्यान केंद्रित रखने वाले होते हैं। ऐसे जातकों में आम तौर पर चर्बी की मात्रा सामान्य से कुछ कम ही रहती है अर्थात ऐसे लोग सामान्य से कुछ पतले ही होते हैं।

मेष राशि में स्थित होने पर शनि बलहीन हो जाते हैं तथा इसी कारण मेष राशि में स्थित शनि को नीच का शनि भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त शनि कुंडली में अपनी स्थिति विशेष के कारण अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव के कारण भी बलहीन हो सकते हैं। शनि पर किन्ही विशेष बुरे ग्रहों का प्रभाव जातक को जोड़ों के दर्द, गठिया, लकवा, हड्डियों का फ्रैकचर तथा हड्डियों से संबंधित अन्य बीमारियों  से पीड़ित कर सकता है। कुंडली में शनि पर किन्ही विशेष ग्रहों का प्रबल प्रभाव कुंडली धारक की सामान्य सेहत तथा आयु पर भी विपरीत प्रभाव डाल सकता है क्योंकि शनि व्यक्ति के आयु के कारक भी होते हैं।

ज्योतिष में राहु का महत्त्व

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भारतीय वैदिक ज्योतिष में राहु को मायावी ग्रह के नाम से भी जाना जाता है तथा मुख्य रूप से राहु मायावी विद्याओं तथा मायावी शक्तियों के ही कारक माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त राहु को बिना सोचे समझे मन में आ जाने वाले विचार, बिना सोचे समझे अचानक मुंह से निकल जाने वाली बात, क्षणों में ही भारी लाभ अथवा हानि देने वाले क्षेत्रों जैसे जुआ, लाटरी, घुड़दौड़ पर पैसा लगाना, इंटरनैट तथा इसके माध्यम से होने वाले व्यवसायों तथा ऐसे ही कई अन्य व्यवसायों तथा क्षेत्रों का कारक माना जाता है।

नवग्रहों में यह अकेला ही ऐसा ग्रह है जो सबसे कम समय में किसी व्यक्ति को करोड़पति, अरबपति या फिर कंगाल भी बना सकता है तथा इसलिए इस ग्रह को मायावी ग्रह के नाम से जाना जाता है। अगर आज के युग की बात करें तो इंटरनैट पर कुछ वर्ष पहले साधारण सी दिखने वाली कुछ वैबसाइटें चलाने वाले लोगों को पता भी नहीं था की कुछ ही समय में उन वैबसाइटों के चलते वे करोड़पति अथवा अरबपति बन जाएंगे। किसी लाटरी के माध्यम से अथवा टैलीविज़न पर होने वाले किसी गेम शो के माध्यम से रातों रात कुछ लोगों को धनवान बना देने का काम भी इसी ग्रह का है।

राहु की अन्य कारक वस्तुओं में लाटरी तथा शेयर बाजार जैसे क्षेत्र, वैज्ञानिक तथा विशेष रूप से वे वैज्ञानिक जो अचानक ही अपने किसी नए अविष्कार के माध्यम से दुनिया भर में प्रसिद्ध हो जाते हैं, इंटरनैट से जुड़े हुए व्यवसाय तथा इन्हें करने वाले लोग, साफ्टवेयर क्षेत्र तथा इससे जुड़े लोग, तम्बाकू का व्यापार तथा सेवन, राजनयिक, राजनेता, राजदूत, विमान चालक, विदेशों में जाकर बसने वाले लोग, अजनबी, चोर, कैदी, नशे का व्यापार करने वाले लोग, सफाई कर्मचारी, कंप्यूटर प्रोग्रामर, ठग, धोखेबाज व्यक्ति, पंछी तथा विशेष रूप से कौवा, ससुराल पक्ष के लोग तथा विशेष रूप से ससुर तथा साला, बिजली का काम करने वाले लोग, कूड़ा-कचरा उठाने वाले लोग, एक आंख से ही देख पाने वाले लोग तथा ऐसे ही अन्य कई प्रकार के क्षेत्र तथा लोग आते हैं।

राहु का विशेष प्रभाव जातक को परा शक्तियों का ज्ञाता भी बना सकता है तथा किसी प्रकार का चमत्कारी अथवा जादूगर भी बना सकता है। दुनिया में विभिन्न मंचों पर अपने जादू के करतब दिखा कर लोगों को हैरान कर देने वाले जादूगर आम तौर पर इसी ग्रह के विशेष प्रभाव में होते हैं तथा काला जादू करने वाले लोग भी राहु के विशेष प्रभाव में ही होते हैं। राहु के प्रबल प्रभाव वाले जातक बातचीत अथवा बहस में आम तौर पर बुध के जातकों पर भी भारी पड़ जाते हैं तथा बहस के बीच में ही कुछ ऐसी बातें अथवा नए तथ्य सामने ले आते हैं जिससे इनका पलड़ा एकदम से भारी हो जाता है, हालांकि अधिकतर मामलों में बाद में इन्हें खुद भी आश्चर्य होता है कि ऐन मौके पर इन्हें उपयुक्त बात सूझ कैसे गई। ऐसा आम तौर पर राहु महाराज की माया के कारण होता है कि जातक मौका आने पर ऐसी बातें भी कह देता है जो खुद उसकी अपनी जानकारी में नहीं होती थी  अचानक ही उसके मुंह से निकल जाती हैं।

राहु एक छाया ग्रह है तथा मनुष्य के शरीर में राहु वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। ज्योतिष की गणनाओं के लिए ज्योतिषियों का एक वर्ग इन्हें पुरुष ग्रह मानता है जबकि ज्योतिषियों का एक अन्य वर्ग इन्हें स्त्री ग्रह मानता है। कुंडली में शुभ राहु का प्रबल प्रभाव कुंडली धारक को विदेशों की सैर करवा सकता है तथा उसे एक या एक से अधिक विदेशी भाषाओं का ज्ञान भी करवा सकता है। कुंडली में राहु के बलहीन होने से अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव में होने से जातक को अपने जीवन में कई बार अचानक आने वाली हानियों तथा समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे जातक बहुत सा धन कमा लेने के बावजूद भी उसे संचित करने में अथवा उस धन से संपत्ति बना लेने में आम तौर पर सक्षम नहीं हो पाते क्योंकि उनका कमाया धन साथ ही साथ खर्च होता रहता है। राहु पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव कुंडली धारक को मानसिक रोगों,अनिद्रा के रोग, बुरे सपने आने की समस्या, त्वचा के रोगों तथा ऐसे ही अन्य कई बीमारियों  से पीड़ित कर सकता है।

ज्योतिष में केतु का महत्व

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भारतीय वैदिक ज्योतिष में केतु को आध्यात्मिकता से जुड़ा ग्रह माना जाता है तथा इसका प्रबल प्रभाव जातक को आध्यात्मिक क्षेत्र में बहुत बड़ीं उपलब्धियां प्राप्त करवा सकता है। हालांकि कोई जातक गुरू के प्रभाव के कारण भी आध्यात्मिक क्षेत्र में उपलब्धियां प्राप्त कर सकता है किन्तु आध्यात्मिक क्षेत्र में होने के बावजूद भी गुरू तथा केतु के प्रभाव वाले जातकों में सामान्यतया बहुत अंतर होता है। गुरू के प्रभाव वाले जातक आम तौर पर अपनी आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ने के साथ-साथ दुनियावी रिश्तों तथा जिम्मेदारियों का पालन करने में भी प्रबल विश्वास रखते हैं जबकि केतु के प्रभाव वाले जातक आम तौर पर आध्यात्म के सामने दुनियादारी तथा रिश्तों-नातों को तुच्छ मानते हैं तथा अपनी दुनियावी जिम्मेदारियां और रिश्ते छोड़ कर केवल आध्यात्म की तरफ ही ध्यान देते हैं।

आध्यात्मिक क्षेत्र में उपलब्धियां प्राप्त कर लेने के पश्चात भी गुरू के प्रभाव वाले लोग आम तौर पर जन कल्याण का मार्ग चुनते हैं तथा लोगों के उद्धार के लिए प्रयासरत हो जाते हैं जबकि केतु के प्रभाव वाले जातक आम तौर पर बहुत सारी आध्यात्मिक उपलब्धियां प्राप्त हो जाने के बावजूद भी दुनियादारी से दूर रहकर अपनी आध्यात्मिक उन्नति की ओर ही बढ़ते रहना पसंद करते हैं। इस प्रकार से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि केतु के प्रभाव वाले जातक आध्यात्मिक क्षेत्र की ओर दुनियादारी से बुरी तरह मोहभंग हो जाने पर ही जाते हैं जबकि गुरू के प्रभाव वाले जातक दुनियादारी तथा आध्यात्म, दोनों में तालमेल बैठा कर दोनों को एक साथ चलाने में सक्षम होते हैं।

केतु भी राहु की भांति ही एक छाया ग्रह हैं तथा मनुष्य के शरीर में केतु मुख्य रूप से अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। ज्योतिष की गणनाओं के लिए केतु को ज्योतिषियों का एक वर्ग तटस्थ अथवा नपुंसक ग्रह मानता है जबकि ज्योतिषियों का एक दूसरा वर्ग इन्हें नर ग्रह मानता है। केतु स्वभाव से मंगल की भांति ही एक क्रूर ग्रह हैं तथा मंगल के प्रतिनिधित्व में आने वाले कई क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व केतु भी करते हैं।

इन क्षेत्रों के अतिरिक्त केतु जिन क्षेत्रों तथा लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं उनमें आध्यात्म तथा आध्यात्मिक रुप से विकसित लोग, परा शक्तियों के क्षेत्र तथा इनकी जानकारी रखने वाले लोग, दवाएं बनाने वाले लोग तथा दवाओं की बिक्री करने वाले लोग, अनुसंधान के क्षेत्र में काम करने वाले लोग, मानवीय इतिहास पर खोज करने वाले लोग, अनाथालय तथा इनके लिए काम करने वाले लोग और संस्थाएं, वृद्ध आश्रम तथा इनके लिए काम करने वाली संस्थाएं, धार्मिक संस्थाएं तथा इनके लिए काम करने वाले लोग, पादरी, जासूस, इतिहासकार, पुरातत्त्ववेत्ता, भूविज्ञानी,गणितज्ञ तथा अन्य कई क्षेत्र, संस्थाएं और व्यक्ति आते हैं। इसके अतिरिक्त केतु नवजात शिशुओं तथा विशेष रूप से नर शिशुओं, कम उम्र के नर बच्चों, चेलों अथवा शिष्यों,  मुकद्दमेबाजी तथा मुकद्दमों, यात्राओं, वृद्ध लोगों, मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों तथा किसी बाहरी बाधा से पीड़ित लोगों के भी कारक माने जाते हैं।

कुंडली में केतु के स्थिति विशेष अथवा किसी बुरे ग्रह की दृष्टि के कारण बलहीन होने पर जातक मानसिक रोगों तथा बाहरी बाधाओं से पीड़ित हो सकता है। इसके अतिरिक्त जातक के शरीर का कोई अंग किसी दुर्घटना अथवा लड़ाई में भंग भी हो सकता है तथा जातक को अपने जीवन में कई बार शल्य चिकित्सा करवानी पड़ सकती है जिसके कारण उसके शरीर की बार-बार चीर-फाड़ हो सकती है। कुंडली में केतु पर किसी बुरे ग्रह का विशेष प्रभाव जातक को कानों तथा पैरों के दर्द अथवा इन अंगों से संबंधित बीमारियों , शरीर पर तेज़ धार हथियार से हमला होने जैसी घटनाओं, मानसिक विक्षिप्तता तथा अत्यन्त  मानसिक पीड़ा से भी पीड़ित कर सकता है। केतु पर किसी बुरे ग्रह का विशेष प्रभाव जातक को जीवन भर शहर से शहर और देश से देश भटकने पर बाध्य कर सकता है। ऐसे जातक अपने जीवन में अधिक समय तक एक स्थान पर टिक कर नहीं रह पाते तथा एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते ही रहते हैं।

ग्रहों के अपने घर (House)अर्थात 12 राशियाँ

अब हम ये जानने की कोशिश करेंगे कि वो कौनसी चीज़ें हैं जों इन ग्रहों को खुश या नाराज़ करती हैं ,

ये सारे ग्रह बारह राशियों में घूमते  रहने के लिए विवश हैं .इन बारह राशियों में कोई घर House  (या कहें राशी ) तो उनका अपना होता है और कोई घर House या राशि उनके मित्र की ,कोई घर (हाउस)उनके शत्रु का होता है और या फ़िर कोई घर (House ) में उनके साथ उनका कोई मित्र बैठकर उनका मूड अच्छा रखता है तो कोई घर( House )में अपने शत्रु के साथ बैठने से इनका मूड खराब हो रहा होता है .बात इतने भर की होती तो क्या कहने हैं मगर इसके अलावा इन ग्रहों के पास जिस घर (हाउस) में बैठते हैं उस घर (House ) पर तो अपनी शक्ति प्रदर्शन का अधिकार होता ही है मगर इन सभी ग्रहों की अपनी – अपनी (कई प्रकार की शक्तियों से संपन्न )नज़र भी होती है ये अपनी नज़र   से जिस घर (House )को देखते हैं उस घर का भाव या  तो शुभ कर देते हैं या तो अशुभ कर देते हैं ,इसके अलावा ये अपनी नज़र  से जिस घर (House )को देखते हैं उस घर( हाउस) के शुभ भाव को (फल ) को कई गुना तक बढ़ा सकते हैं या बुरे भाव या फल को कई गुना अधिक बुरा कर सकते हैं ,मगर ये सब उनके मूड पर निर्भर करता है ,उनका मूड कैसे बनता है और बिगड़ता है ये हम हमारे दैनिक जीवन की बातों से ही समझ सकते हैं .एक बात तो पक्की है कि कि सभी नौ ग्रहों की सातवीं दृष्टी होती है ,इसका अर्थ है कि वो जिस घर(House )  में बैठे होते हैं उस घर( House )को गिनते हुए यदि हम आगे चलेंग तो जो सातवाँ घर  (House )होता है वहां उनकी सीधी दृष्टी होती है और वो अपनी इस सीधी दृष्टी या नज़र से अपने से सातवें घर का (House )भाव कैसे कम या ज्यादा कर रहे होते हैं हम इन ग्रहों के स्वभाव के बारे में जानेगे तो समझ जायेंगे .अभी इसी समय हमारे लिए यह भी जान लेना जरूरी है कि जिस तरह हम किसी भी घर House में रहते हैं तो हमें उस घर ( House )का कोई कमरा तो पसंद आता है और कोई बिलकुल नहीं पसंद आता ,इसी तरह जब ये नौ ग्रह किसी एक राशि में होते है तो वो राशी इनकी पसंद की होती है या नहीं मगर उस राशी के कुछ हिस्से होते हैं जों उन्हें कुछ ज्यादा या कम पसंद होते हैं वो हिस्से क्या हैं? वो हिस्से नक्षत्र हैं अर्थात हर राशी के अंतर्गत लगभग तीन नक्षत्र आते हैं उन नक्षत्रों का इन नौ ग्रहों में से ही कोई न कोई मालिक होता है और इनकी उस मालिक से कितनी बनती  है या ठनती है इसी बात पर निर्भर करता है कि उनकी उस मालिक से कैसी दोस्ती और कैसी दुश्मनी है

अब समय है सबसे पहले यह जान लेने का कि बारह राशियाँ कौनसी हैं और उनके मालिक कौन हैं---------

1.मेष Aries -मंगल (Mars)ग्रह की राशी  या कहें उसका सौरमंडल में मंगल ग्रह का अपना और  पहला घर .

2.वृष Taurus-शुक्र(Venus) ग्रह की राशी या कहें कि  सौरमंडल में शुक्र ग्रह का  अपना और पहला घर.

3.मिथुन Gemini-बुध (Mercury) ग्रह की राशि या  कहें कि उसका सौरमंडल में बुध ग्रह का अपना और पहला घर.

4.कर्क Cancer-चन्द्रमा (The Moon ) हमारे ज्योतिष शाश्त्र में चंद्रमा  का अपना एक मात्र  घर या राशी .

5.सिंह Leo -सूर्य (The Sun) का अपना एक मात्र घर या राशी .

6.कन्याVirgo -बुध (Mercury) ग्रह की राशि या उसका सौरमंडल में बुध ग्रह का अपना दूसरा घर जहां वो बच्चा जैसा कम और बड़ों जैसा ज्यादा रहता है .

7.तुला Libra-शुक्र (Venus) ग्रह की राशि या उसका सौरमंडल में शुक्र ग्रह का अपना दूसरा घर जहां शुक्र  ग्रह अपनी पूरी रूमानियत को ज़िंदा रखता  है  .

8.वृश्चिक Scorpio-मंगल (Mars) ग्रह की राशि या उसका सौरमंडल में मंगल ग्रह का अपना दूसरा घर.

9.धनु Sagittarius-बृहस्पति(Jupiter) ग्रह की राशि या उसका सौरमंडल में अपना पहला घर.

10.मकर Capricorn -शनि (Saturn) ग्रह की राशि या उसका सौरमंडल में अपना पहला घर.

11.कुम्भ Aquarius -शनि (Saturn) ग्रह की राशि या उसका सौरमंडल में अपना दूसरा घर घर.

12.मीन Pisces  -बृहस्पति (Jupiter) ग्रह की राशि या उसका सौरमंडल में अपना दूसरा घर .

उच्च तथा नीच राषि के ग्रह

भारतवर्ष में अधिकतर ज्योतिषियों तथा ज्योतिष में रूचि रखने वाले लोगों के मन में उच्च तथा नीचराशियों में स्थित ग्रहों को लेकर एक प्रबल धारणा बनी हुई है कि अपनी उच्च राशि में स्थित ग्रह सदा शुभफल देता है तथा अपनी नीच राशि में स्थित ग्रह सदा नीच फल देता है। उदाहरण के लिए शनि ग्रह को तुलाराशि में स्थित होने से अतिरिक्त बल प्राप्त होता है तथा इसीलिए तुला राशि में स्थित शनि को उच्च काशनि कह कर संबोधित किया जाता है और अधिकतर ज्योतिषियों का यह मानना है कि तुला राशि मेंस्थित शनि कुंडली धारक के लिए सदा शुभ फलदायी होता है

किंतु यह धारणा एक भ्रांति से अधिक कुछ नहीं है तथा इसका वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं है औरइसी भ्रांति में विश्वास करके बहुत से ज्योतिष प्रेमी जीवन भर नुकसान उठाते रहते हैं क्योंकि उनकीकुंडली में तुला राशि में स्थित शनि वास्तव में अशुभ फलदायी होता है तथा वे इसे शुभ फलदायी मानकरअपने जीवन में आ रही समस्याओं का कारण दूसरे ग्रहों में खोजते रहते हैं तथा अपनी कुंडली में स्थितअशुभ फलदायी शनि के अशुभ फलों में कमी लाने का कोई प्रयास तक नहीं करते। इस चर्चा को आगेबढ़ाने से पहले आइए एक नजर में ग्रहों के उच्च तथा नीच राशियों में स्थित होने की स्थिति पर विचार करलें।

नवग्रहों में से प्रत्येक ग्रह को किसी एक राशि विशेष में स्थित होने से अतिरिक्त बल प्राप्त होता है जिसे इसग्रह की उच्च की राशि कहा जाता है। इसी तरह अपनी उच्च की राशि से ठीक सातवीं राशि में स्थित होनेपर प्रत्येक ग्रह के बल में कमी आ जाती है तथा इस राशि को इस ग्रह की नीच की राशि कहा जाता है।उदाहरण के लिए शनि ग्रह की उच्च की राशि तुला है तथा इस राशि से ठीक सातवीं राशि अर्थात मेष राशिशनि ग्रह की नीच की राशि है तथा मेष में स्थित होने से शनि ग्रह का बल क्षीण हो जाता है। इसी प्रकार हरएक ग्रह की 12 राशियों में से एक उच्च की राशि तथा एक नीच की राशि होती है।

किंतु यहां पर यह समझ लेना अति आवश्यक है कि किसी भी ग्रह के अपनी उच्च या नीच की राशि मेंस्थित होने का संबंध केवल उसके बलवान या बलहीन होने से होता है न कि उसके शुभ या अशुभ होने से।तुला में स्थित शनि भी कुंडली धारक को बहुत से अशुभ फल दे सकता है जबकि मेष राशि में स्थित नीचराशि का शनि भी कुंडली धारक को बहुत से लाभ दे सकता है। इसलिए ज्योतिष में रूचि रखने वाले लोगोंको यह बात भली भांति समझ लेनी चाहिए कि उच्च या नीच राशि में स्थित होने का प्रभाव केवल ग्रह केबल पर पड़ता है न कि उसके स्वभाव पर।

शनि नवग्रहों में सबसे धीमी गति से भ्रमण करते हैं तथा एक राशि में लगभग अढ़ाई वर्ष तक रहते हैंअर्थात शनि अपनी उच्च की राशि तुला तथा नीच की राशि मेष में भी अढ़ाई वर्ष तक लगातार स्थित रहतेहैं। यदि ग्रहों के अपनी उच्च या नीच राशियों में स्थित होने से शुभ या अशुभ होने की प्रचलित धारणा कोसत्य मान लिया जाए तो इसका अर्थ यह निकलता है कि शनि के तुला में स्थित रहने के अढ़ाई वर्ष केसमय काल में जन्में प्रत्येक व्यक्ति के लिए शनि शुभ फलदायी होंगे क्योंकि इन वर्षों में जन्में सभी लोगोंकी जन्म कुंडली में शनि अपनी उच्च की राशि तुला में ही स्थित होंगे। यह विचार व्यवहारिकता कीकसौटी पर बिलकुल भी नहीं टिकता क्योंकि देश तथा काल के हिसाब से हर ग्रह अपना स्वभाव थोड़े-थोड़ेसमय के पश्चात ही बदलता रहता है तथा किसी भी ग्रह का स्वभाव कुछ घंटों के लिए भी एक जैसा नहींरहता, फिर अढ़ाई वर्ष तो बहुत लंबा समय है।

इसलिए ग्रहों के अपनी उच्च या नीच की राशि में स्थित होने का मतलब केवल उनके बलवान या बलहीनहोने से समझना चाहिए न कि उनके शुभ या अशुभ होने से। मैने अपने ज्योतिष अभ्यास के कार्यकाल मेंऐसी बहुत सी कुंडलियां देखी हैं जिनमें अपनी उच्च की राशि में स्थित कोई ग्रह बहुत अशुभ फल दे रहाहोता है क्योंकि अपनी उच्च की राशि में स्थित होने से ग्रह बहुत बलवान हो जाता है, इसलिए उसके अशुभहोने की स्थिति में वह अपने बलवान होने के कारण सामान्य से बहुत अधिक हानि करता है। इसी तरहमेरे अनुभव में ऐसीं भी बहुत सी कुंडलियां आयीं हैं जिनमें कोई ग्रह अपनी नीच की राशि में स्थित होने परभी स्वभाव से शुभ फल दे रहा होता है किन्तु बलहीन होने के कारण इन शुभ फलों में कुछ न कुछ कमी रहजाती है। ऐसे लोगों को अपनी कुंडली में नीच राशि में स्थित किन्तु शुभ फलदायी ग्रहों के रत्न धारण करनेसे बहुत लाभ होता है क्योंकि ऐसे ग्रहों के रत्न धारण करने से इन ग्रहों को अतिरिक्त बल मिलता है तथा यहग्रह बलवान होकर अपने शुभ फलों में वृद्धि करने में सक्षम हो जाते हैं।

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वक्री ग्रह

लगभग हर दूसरे व्यक्ति की जन्म कुंडली में एक या इससे अधिक वक्री ग्रह पाये जाते हैं तथा ज्योतिष मेंरूचि रखने वाले अधिकतर लोगों के मन में यह जिज्ञासा बनी रहती है कि उनकी कुंडली में वक्री बताएजाने वाले इस ग्रह का क्या मतलब हो सकता है। वक्री ग्रहों को लेकर भिन्न-भिन्न ज्योतिषियों तथापंडितों के भिन्न-भिन्न मत हैं तथा आज हम वक्री ग्रहों के बारे में ही चर्चा करेंगे। सबसे पहले यह जान लेंकि वक्री ग्रह की परिभाषा क्या है।

कोई भी ग्रह विशेष जब अपनी सामान्य दिशा की बजाए उल्टी दिशा यानि विपरीत दिशा में चलना शुरूकर देता है तो ऐसे ग्रह की इस गति को वक्र गति कहा जाता है तथा वक्र गति से चलने वाले ऐसे ग्रह विशेषको वक्री ग्रह कहा जाता है। उदाहरण के लिए शनि यदि अपनी सामान्य गति से कन्या राशि में भ्रमण कररहे हैं तो इसका अर्थ यह होता है कि शनि कन्या से तुला राशि की तरफ जा रहे हैं, किन्तु वक्री होने कीस्थिति में शनि उल्टी दिशा में चलना शुरू कर देते हैं अर्थात शनि कन्या से तुला राशि की ओर न चलते हुएकन्या राशि से सिंह राशि की ओर चलना शुरू कर देते हैं और जैसे ही शनि का वक्र दिशा में चलने का यहसमय काल समाप्त हो जाता है, वे पुनरू अपनी सामान्य गति और दिशा में कन्या राशि से तुला राशि कीतरफ चलना शुरू कर देते हैं। वक्र दिशा में चलने वाले अर्थात वक्री होने वाले बाकि के सभी ग्रह भी इसीतरह का व्यवहार करते हैं।

वक्री ग्रहों की परिभाषा जान लेने के पश्चात आइए अब देखें कि दुनिया भर के ज्योतिषि वक्री ग्रहों के बारेमें मुख्य रूप से क्या धारणाएं रखते हैं। सबसे पहले चर्चा करते हैं ज्योतिषियों के उस वर्ग विशेष की जो यहधारणा रखता है कि वक्री ग्रह किसी भी कुंडली में सदा अशुभ फल ही प्रदान करते हैं क्योंकि वक्री ग्रह उल्टीदिशा में चलते हैं इसलिए उनके फल अशुभ ही होंगे। ज्योतिषियों का एक दूसरा वर्ग मानता है कि वक्री ग्रहकिसी कुंडली विशेष में अपने कुदरती स्वभाव से विपरीत आचरण करते हैं अर्थात अगर कोई ग्रह किसीकुंडली में सामान्य रूप से शुभ फल दे रहा है तो वक्री होने की स्थिति में वह अशुभ फल देना शुरू कर देताहै। इसी प्रकार अगर कोई ग्रह किसी कुंडली में सामान्य रूप से अशुभ फल दे रहा है तो वक्री होने की स्थितिमें वह शुभ फल देना शुरू कर देता है। इस धारणा के मूल में यह विश्वास है कि क्योंकि वक्री ग्रह उल्टी दिशामें चलने लगता है इसलिए उसका शुभ या अशुभ प्रभाव भी सामान्य से उल्टा हो जाता है।

ज्योतिषियों का एक और वर्ग यह मानता है कि अगर कोई ग्रह अपनी उच्च की राशि में स्थित होने परवक्री हो जाता है तो उसके फल अशुभ हो जाते हैं तथा यदि कोई ग्रह अपनी नीच की राशि में वक्री हो जाताहै तो उसके फल शुभ हो जाते हैं। इसके पश्चात ज्योतिषियों का एक और वर्ग है जो यह धारणा रखता है किवक्री ग्रहों के प्रभाव बिल्कुल सामान्य गति से चलने वाले ग्रहों की तरह ही होते हैं तथा उनमें कुछ भी अंतरनहीं आता। ज्योतिषियों के इस वर्ग का यह मानना है कि प्रत्येक ग्रह केवल सामान्य दिशा में ही भ्रमणकरता है तथा कोई भी ग्रह सामान्य से उल्टी दिशा में भ्रमण करने में सक्षम नहीं होता।

सबसे पहले तो यह जान लें कि किसी भी वक्री ग्रह का व्यवहार उसके सामान्य होने की स्थिति से अलगहोता है तथा वक्री और सामान्य ग्रहों को एक जैसा नही मानना चाहिए। किन्तु यहां पर यह जान लेना भीआवश्यक है कि अधिकतर मामलों में किसी ग्रह के वक्री होने से कुंडली में उसके शुभ या अशुभ होने कीस्थिति में कोई फर्क नही पड़ता अर्थात सामान्य स्थिति में किसी कुंडली में शुभ फल प्रदान करने वाला ग्रहवक्री होने की स्थिति में भी शुभ फल ही प्रदान करेगा तथा सामान्य स्थिति में किसी कुंडली में अशुभ फलप्रदान करने वाला ग्रह वक्री होने की स्थिति में भी अशुभ फल ही प्रदान करेगा। अधिकतर मामलों में ग्रहके वक्री होने की स्थिति में उसके स्वभाव में कोई फर्क नहीं आता किन्तु उसके व्यवहार में कुछ बदलावअवश्य आ जाते हैं। वक्री होने की स्थिति में किसी ग्रह विशेष के व्यवहार में आने वाले इन बदलावों के बारेमें जानने से पहले यह जान लें कि नवग्रहों में सूर्य तथा चन्द्र सदा सामान्य दिशा में ही चलते हैं तथा यहदोनों ग्रह कभी भी वक्री नहीं होते। इनके अतिरिक्त राहु-केतु सदा उल्टी दिशा में ही चलते हैं अर्थात हमेशाही वक्री रहते हैं। इसलिए सूर्य-चन्द्र तथा राहु-केतु के फल तथा व्यवहार सदा सामान्य ही रहते हैं तथाइनमें कोई अंतर नहीं आता। आइए अब देखें कि बाकी के पांच ग्रहों के स्वभाव और व्यवहार में उनके वक्रीहोने की स्थिति में क्या अंतर आते हैं।

गुरू: वक्री होने पर गुरू के शुभ या अशुभ फल देने के स्वभाव में कोई अंतर नहीं आता अर्थात किसी कुंडलीविशेष में सामान्य रूप से शुभ फल देने वाले गुरू वक्री होने की स्थिति में भी उस कुंडली में शुभ फल हीप्रदान करेंगे तथा किसी कुंडली विशेष में सामान्य रूप से अशुभ फल देने वाले गुरू वक्री होने की स्थिति मेंभी उस कुंडली में अशुभ फल ही प्रदान करेंगे किन्तु वक्री होने से गुरू के व्यवहार में कुछ बदलाव अवश्यआ जाते हैं। वक्री होने की स्थिति में गुरू कई बार पर शुभ या अशुभ फल देने में देरी कर देते हैं। वक्री होनेकी स्थिति में गुरू बहुत बार कुंडली धारक को दूसरों को बिना मांगी सलाह या उपदेश देने की आदत प्रदानकर देते हैं। ऐसे लोगों को बहुत बार अपने ज्ञान का इस्तेमाल करने की सही दिशा का पता नहीं लगता तथाइसी आदत के चलते ऐसे लोग कई बार अपने आस पास के लोगों को व्यर्थ में ही उपदेश देना शुरू कर देतेहैं। इन बदलावों के अतिरिक्त आम तौर पर वक्री गुरू अपने सामान्य स्वभाव की तरह ही आचरण करतेहैं।

शुक्र: वक्री होने पर शुक्र के शुभ या अशुभ फल देने के स्वभाव में कोई अंतर नहीं आता अर्थात किसीकुंडली विशेष में सामान्य रूप से शुभ फल देने वाले शुक्र वक्री होने की स्थिति में भी उस कुंडली में शुभफल ही प्रदान करेंगे तथा किसी कुंडली विशेष में सामान्य रूप से अशुभ फल देने वाले शुक्र वक्री होने कीस्थिति में भी उस कुंडली में अशुभ फल ही प्रदान करेंगे किन्तु वक्री होने से शुक्र के व्यवहार में कुछबदलाव अवश्य आ जाते हैं। वक्री शुक्र आम तौर पर कुंडली धारक को सामान्य से अधिक संवेदनशील बनादेते हैं तथा ऐसे लोग विशेष रूप से अपने प्रेम संबंधों तथा अपने जीवन साथी को लेकर बहुत भावुक, तथाअधिकार जताने वाले होते हैं। पुरुषों की जन्म कुंडली में स्थित वक्री शुक्र जहां उन्हें अति भावुक तथासंवेदनशील बनाने में सक्षम होता है वही पर महिलाओं की जन्म कुंडली में स्थित वक्री शुक्र उन्हेंआक्रमकता प्रदान करता है। ऐसी महिलाएं आम तौर पर अपने प्रेमी या जीवन साथी पर अपना नियंत्रणरखती हैं तथा संबंध टूट जाने की स्थिति में आसानी से अपने प्रेमी या जीवन साथी का पीछा नहीं छोड़तींऔर कई बार बदला लेने पर भी उतारु हो जाती हैं। इन बदलावों के अतिरिक्त आम तौर पर वक्री शुक्र अपनेसामान्य स्वभाव की तरह ही आचरण करते हैं।

मंगल: वक्री होने पर मंगल के शुभ या अशुभ फल देने के स्वभाव में कोई अंतर नहीं आता अर्थात किसीकुंडली विशेष में सामान्य रूप से शुभ फल देने वाले मंगल वक्री होने की स्थिति में भी उस कुंडली में शुभफल ही प्रदान करेंगे तथा किसी कुंडली विशेष में सामान्य रूप से अशुभ फल देने वाले मंगल वक्री होने कीस्थिति में भी उस कुंडली में अशुभ फल ही प्रदान करेंगे किन्तु वक्री होने से मंगल के व्यवहार में कुछबदलाव अवश्य आ जाते हैं। वक्री मंगल आम तौर पर कुंडली धारक को सामान्य से अधिक शारीरिक तथामानसिक उर्जा प्रदान कर देते हैं जिसका सही दिशा में उपयोग करने में आम तौर पर कुंडली धारक सक्षमनहीं हो पाते तथा इसलिए वे इस अतिरिक्त उर्जा को लेकर परेशान रहते हैं और कई बार यह उर्जा उनकेअचानक ही प्रकट हो जाने वाले गुस्से अथवा चिढ़चिढ़ेपन के रूप में देखने के रूप में बाहर निकलती है। इसउर्जा के कारण ऐसे लोग अपने जीवन में कई बार अचानक ही बड़े अप्रत्याशित निर्णय ले लेते हैं जिससेइनके स्वभाव के बारे में कोई ठोस धारणा बना पाना कठिन हो जाता है। महिलाओं की जन्म कुंडली मेंस्थित वक्री मंगल आम तौर पर उन्हें पुरुषों के गुण प्रदान कर देता है तथा ऐसी महिलाएं पुरुषों के कार्यक्षेत्रों में काम करने तथा पुरुषों को सफलता पूर्वक नियत्रित करने में सक्षम होती हैं। इन बदलावों केअतिरिक्त आम तौर पर वक्री मंगल अपने सामान्य स्वभाव की तरह ही आचरण करते हैं।

बुध: वक्री होने पर बुध के शुभ या अशुभ फल देने के स्वभाव में कोई अंतर नहीं आता अर्थात किसी कुंडलीविशेष में सामान्य रूप से शुभ फल देने वाले बुध वक्री होने की स्थिति में भी उस कुंडली में शुभ फल हीप्रदान करेंगे तथा किसी कुंडली विशेष में सामान्य रूप से अशुभ फल देने वाले बुध वक्री होने की स्थिति मेंभी उस कुंडली में अशुभ फल ही प्रदान करेंगे किन्तु वक्री होने से बुध के व्यवहार में कुछ बदलाव अवश्यआ जाते हैं। वक्री बुध आम तौर पर कुंडली धारक की बातचीत करने की क्षमता तथा निर्णय लेने कीक्षमता को प्रभावित कर देते हैं। ऐसे लोग आम तौर पर या तो सामान्य से अधिक बोलने वाले होते हैं याफिर बिल्कुल ही कम बोलने वाले। कई बार ऐसे लोग बहुत कुछ बोलना चाह कर भी कुछ बोल नहीं पातेतथा कई बार कुछ न बोलने वाली स्थिति में भी बहुत कुछ बोल जाते हैं। ऐसे लोग वक्री बुध के प्रभाव मेंआकर जीवन मे अनेक बार बड़े अप्रत्याशित तथा अटपटे से लगने वाले निर्णय ले लेते हैं जो परिस्थितियोंके हिसाब से लिए जाने वाले निर्णय के एकदम विपरीत हो सकते हैं तथा जिनके लिए कई बार ऐसे लोगबाद में पछतावा भी करते हैं किन्तु वक्री बुध के प्रभाव में आकर ये लोग अपने जीवन में ऐसे निर्णय लेतेही रहते हैं। इन बदलावों के अतिरिक्त आम तौर पर वक्री बुध अपने सामान्य स्वभाव की तरह ही आचरणकरते हैं।

शनि: वक्री होने की स्थिति में शनि महाराज के स्वभाव तथा व्यवहार में क्या बदलाव आ जाते हैं। समस्तग्रहों में से शनि ही एकमात्र ऐसे ग्रह हैं जो वक्री होने की स्थिति में कुंडली धारक को कुछ न कुछ अशुभ फलअवश्य प्रदान करते हैं फिर चाहे किसी कुंडली में उनका स्वभाव कितना ही शुभ फल देने वाला क्यों न हो।किन्तु वक्री होने की स्थिति में शनि के स्वभाव में एक नकारात्मकता अवश्य आ जाती है जो कुंडली धारकके लिए कुछ समस्याओं से लेकर बहुत भारी विपत्तियां तक लाने में सक्षम होती है। यदि शनि किसी कुंडलीमें सामान्य रूप से शुभ फलदायी होकर वक्री हैं तो कुंडली धारक को अपेकक्षाकृत कम नुकसान पहुंचाते हैंतथा ऐसी स्थिति में कुंडली में इनका स्वभाव मिश्रित हो जाता है जो कुंडली धारक को कभी लाभ तो कभीहानि देता है। किन्तु यदि शनि किसी कुंडली में सामान्य रूप से अशुभ फलदायी होकर वक्री हैं तो कुंडलीधारक को अपेकक्षाकृत बहुत अधिक नुकसान पहुंचाते हैं। किसी कुंडली में शनि सबसे अधिक नुकसानतब पहुंचाते हैं जब वे तुला राशि में स्थित हो, सामान्य रूप से अशुभ फलदायी हों तथा इसके साथ ही वक्रीभी हों। तुला राशि में स्थित होकर शनि को अतिरिक्त बल प्राप्त होता है तथा अशुभ होने की स्थिति में शनिवैसे ही इस अतिरिक्त बल के चलते सामान्य से अधिक हानि करने में सक्षम होते हैं किन्तु ऐसी स्थिति मेंवक्री होने से उनकी नकारात्मकता में और भी वृद्धि हो जाती है तथा इस स्थिति में कुंडली धारक को दूसरेग्रहों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए बहुत भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है।

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अस्त ग्रह

ज्योतिषि के लिए किसी भी जातक की जन्म कुंडली का देखते समय अस्त ग्रहों का विचार आवश्यक है।किसी भी कुंडली में पाये जाने वाले अस्त ग्रहों का अपना एक विशेष महत्व होता है तथा इन्हें भली भांतिसमझ लेना एक अच्छे ज्योतिषि के लिए अति आवश्यक होता है। अस्त ग्रहों का विचार किए बिना जातकके विषय में की गईं कई भविष्यवाणियां गलत हो सकती हैं, इसलिए इनकी ओर विशेष ध्यान देनाचाहिए। आइए समझते हैं कि एक ग्रह को अस्त ग्रह कब कहा जाता है तथा अस्त होने से किसी ग्रह कीकार्यप्रणाली में क्या प्राभाव होता है।

गगन मंडल में कोई भी ग्रह जब सूर्य से एक निश्चित दूरी के अंदर आ जाता है तो सूर्य के तेज से वह ग्रहअपना तेज तथा शक्ति खोने लगता है जिसके कारण वह गगन मंडल में दिखाई देना बंद हो जाता है तथाइस ग्रह को अस्त ग्रह का नाम दिया जाता है। प्रत्येक ग्रह की सूर्य से यह समीपता डिग्रियों में मापी जातीहै तथा इस मापदंड के अनुसार प्रत्येक ग्रह सूर्य से निम्नलिखित दूरी के अंदर आने पर अस्त हो जाता है:

चन्द्रमा सूर्य के दोनों ओर 12 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। बुध सूर्य के दोनोंओर 14 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। किन्तु यदि बुध अपनी सामान्य गतिकी बनिस्पत वक्र गति से चल रहे हों तो वह सूर्य के दोनों ओर 12 डिग्री या इससे अधिक समीप आने परअस्त माने जाते हैं।

गुरू सूर्य के दोनों ओर 11 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं शुक्र सूर्य के दोनोंओर 10 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। किन्तु यदि शुक्र अपनी सामान्य गतिकी बनिस्पत वक्र गति से चल रहे हों तो वह सूर्य के दोनों ओर 8 डिग्री या इससे अधिक समीप आने परअस्त माने जाते हैं।

शनि सूर्य के दोनों ओर 15 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।

राहु-केतु छाया ग्रह होने के कारण कभी भी अस्त नहीं होते। हमेशा वर्की रहते है।

किसी भी ग्रह के अस्त हो जाने की स्थिति में उसके प्रभाव में कमी आ जाती है तथा वह किसी कुंडली मेंसुचारू रुप से कार्य करने में सक्षम नहीं रह जाता। किसी भी अस्त ग्रह की प्राभावहीनता का सही अनुमानलगाने के लिए उस ग्रह का किसी कुंडली में स्थिति के कारण बल, सूर्य का उसी कुंडली विशेष में बल तथाअस्त ग्रह की सूर्य से दूरी देखना आवश्यक होता है। तत्पश्चात ही उस ग्रह की कार्य क्षमता के बारे में सहीजानकारी प्राप्त हो सकती है। उदाहरण के लिए किसी कुंडली में गुरू सूर्य से 11 डिग्री दूर होने पर भी अस्तकहलाएंगे तथा 1 डिग्री दूर होने पर भी अस्त ही कहलाएंगे, किन्तु पहली स्थिति में कुंडली में गुरू का बलदूसरी स्थिति के मुकाबले अधिक होगा क्योंकि जितना ही कोई ग्रह सूर्य के पास आ जाता है, उतना हीउसका बल क्षीण होता जाता है। इसलिए अस्त ग्रहों का अध्ययन बहुत ध्यानपूर्वक करना चाहिए जिससेकि उनके किसी कुंडली विशेष में सही बल का पता चल सके।

अस्त ग्रहों के पूर्ण शुभ प्रभाव को प्र्राप्त करने हेतु अतिरिक्त बल की आवश्यकता होती है तथा कुंडली मेंकिसी अस्त ग्रह का अध्ययन के बाद ही यह निर्णय किया जाता है कि उस अस्त ग्रह को अतिरिक्त बलकैसे प्रदान किया जा सकता है। यदि किसी कुंडली में कोई ग्रह अस्त होने के साथ साथ स्वभाव से शुभफलदायी है तो उसे अतिरिक्त बल प्रदान करने का सबसे उचित उपाय है, कुंडली धारक को उस ग्रह विशेषका रत्न धारण करवा देना। रत्न का वजन अस्त ग्रह की प्राभावहीनता का सही अनुमान लगाने के बाद हीतय किया जाना चाहिए। इस प्रकार उस अस्त ग्रह को अतिरिक्त बल मिल जाता है जिससे वह अपना कार्यसुचारू रूप से करने में सक्षम हो जाता है।

किन्तु यदि किसी कुंडली में कोई ग्रह अस्त होने के साथ साथ अशुभ फलदायी है तो ऐसे ग्रह को उसके रत्नके द्वारा अतिरिक्त बल नही दिया जाता क्योंकि किसी ग्रह के अशुभ होने की स्थिति में उसके रत्न का प्रयोगसर्वथा वर्जित है, भले ही वह ग्रह कितना भी बलहीन हो। ऐसी स्थिति में किसी भी अस्त ग्रह को बल देनेका सबसे उचित तथा प्रभावशाली उपाय उस ग्रह का मंत्र जप होता है। ऐसी स्थिति में उस ग्रह के मंत्र कानिरंतर जाप करने से या उस ग्रह के मंत्र जप पूजा करवाने से ग्रह को अतिरिक्त बल तो मिलता ही है, साथही साथ उसका दुष्प्रभाव से शुभप्रभाव शुरू हो जाता है। .

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